नए सिरे से बंधे संयुक्त परिवार की डोर
आज हम
संक्रमण के निर्णायक दौर से गुजर रहे है। इसमें जहां एक ओर पुरानी रुढियों, रीति
रिवाजों और विचारों की दीवारें दरक- दरक कर गिर रही है, वहीं नए और तौर- तरीके
अपनी जगह लेने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं। लेकिन यह दोनों के मिलने पर समान
भागीदारी से ही नए समाज का निर्माण संभव है। परिवार के बारे में भी यही बात लागु
होती है। बढते समय में बढती मुश्किलें ने एक बार फिर संयुक्त परिवार के बारे में
सोचने को मजबुर कर रही है। किंतु पुराने ढंग के ʼसंयुक्त परिवारʼ को बिल्कुल उसी
रुप में स्वीकार नही किया जा सकता। इनमें भी मौलिक कमियां रही है जिन्हे नकारा नही
जा सकता। इसलिए आज के समय में चुनौतियों और वास्तविकता के मुताबिक इस संयुक्त
परिवार का स्वरुप कैसा हो यह सोचना जरुरी है।
वर्तमान का हमारा समाज एक ऐसी पीढी से बना है, जिसने स्वयं ʼसंयुक्त
परिवारʼ की गोद में आंखे खोली और फिर आगे बढकर एकल परिवार की स्थापना की। जरुरतों
और स्वतंत्रता की चाहत ने ʼएकल परिवारʼ व्यवस्था को जन्म दिया। जिसने इस पीढी को
पंरपराओं की उन बंदिशो से मुक्त किया जो कि रुढियां बन चुकी थी। आज के समय में भी
कई परिवार ऐसे देखने को मिलते है जो आपसी मतभेद के कारण बिखरते जा रहे है। ऐसे में
परिवारों में टुटते मूल्यों और एकल परिवारों को देख भले ही पुरानी पीढी कही न कही
दुःखी हो। लेकिन धीरे- धीरे पुरानी पीढी ने भी इसे अपनाना शुरु कर दिया। और जमीनी
सच्चाइयों से जुड़कर वह इसमें सहज होने लगी है। आज शहरों में विकास के नाम पर गगनचुंबी
इमारतों में अपार्टमेंट की बढती संख्या में सिर्फ एकल परिवारों को देखा जा सकता
है। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में ऐसे हालात पैदा हो रहे है कि पारिवारिक सदस्यों की
उपयोगिता और उनका महत्व भी अब कम होने लगा। इस स्वतंत्रता और स्वच्छंदता पाने की
आस में संयुक्त परिवारों से अलग होने वाली पीढी आज खुद स्वयं से प्रश्न कर सकती है
कि उनने कितना कुछ नही खो दिया। एकल परिवार की एकमात्र बड़ी खासियत यह है कि वह
व्यक्ति को अपनी काबिलियत सिद्ध कराने के मौके देता है। लेकिन कमियां भी हमारे
सामने मौजुद है। हालांकि अब फिर से लोगों में संयुक्त परिवार की अवधारणा को लेकर
जरुरत फिर से बढने लगी है।
हाल ही में एक मेट्रोमोनियल साइट के सर्वे में 65 प्रतिशत युवतियों ने
चाहा कि शादी के बाद भी माता- पिता के साथ रहना चाहेगें। कुल मिलाकर दोनों का ही
संयुक्त परिवार में रहने का झुकाव ज्यादा है। अब इसे समय की मांग कहे या जरुरतों
को पूरा करने और जिम्मेदारियों को बांट लेने की सोच। आज की नई पीढी घर और परिवार
के साथ रहने को तवज्जो देना चाह रही है। आए दिन बढ रहे वृद्धाश्रमों और उनमें
बुजुर्गों की संख्या से भी यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने ही संयुक्त परिवार
आपसी प्रेम- सहकार और लापरवाही के अभाव में टुट गए। परिणामस्वरुप समाज में व्यक्ति
को अपनी कठिनाइयां, समस्याएं या दुःख बांटने के लिए भी कोई कंधा नही मिलता। इंसान
भावनात्मक रूप से विकलांग होता जा रहा है। जिससे कई तनाव से पनपी समस्याएं भी
सामने आ रही है। कभी कहा जाता था जिस घर में बच्चों की हंसी और बड़ों की खांसी न
हो वह अधुरा होता है। अब समय है इस विषय को गंभीरता से समझने का। एकल परिवार में
सबसे अधिक खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। ऐसे मे बच्चों को सांस्कृतिक मुल्य
देना मुश्किल हो जाता है। सांस्कृतिक मुल्यों को बच्चे अपने बड़े- बुजुर्गों से ही
विरासत के तौर पर प्राप्त करते है। छोटे बच्चों को पालने के तनाव से बचने के लिए
व्यस्त माता- पिता को बच्चे ʼचाइल्ड केयरʼ संस्थाओं के भरोसे छोड़ना पड़ता है।
एकल परिवारों में आने वाली इन
कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए आज नए तरह के संयुक्त परिवार की नींव रखने की
जरुरत है। इनमें मौलिक आधार तो पुराने होने चाहिए, लेकिन परिवार के सभी लोगों में
आपसी समझ और संवाद स्थापित करने की जरुरी है। इसमें हमें पुराने तरह के संयुक्त
परिवार की खामियों से भी बचना होगा, जिनके कारण नई पीढी अलग होना सही मानने लगी। जिनमे
मुख्य कारण रहा पुरानी पीढी का वह रवैया जिसने छोटों की बात और सोच को अपने आगे
कुछ नही समझा। अब जरुरी है कि परिवारों में बड़ों की ओर से छोटों को अपनी बात रखने
के लिए प्रेरित किया जाए। ऐसा होने पर वे खुद-ब-खुद बड़ों में सहज महसुस करने
लगेगी। पुराने संयुक्त परिवार में एक ही व्यक्ति का हुक्म चलने से छोटो के विचारों
और सलाह को तवज्जों देने की उम्मीद बेमानी थी।
हाल ही में एक मेट्रोमोनियल
साइट के सर्वे में 65 प्रतिशत युवतियों ने चाहा कि शादी के बाद भी माता- पिता के
साथ रहना चाहेगें। कुल मिलाकर दोनों का ही संयुक्त परिवार में रहने का झुकाव ज्यादा
है। अब इसे समय की मांग कहे या जरुरतों को पूरा करने और जिम्मेदारियों को बांट
लेने की सोच। आज की नई पीढी घर और परिवार के साथ रहने को तवज्जो देना चाह रही है। इस
प्रकार नए तरह के पारिवारिक तंत्र में इस पक्ष को अपनाने से भविष्य के संतुलित
समाज की कल्पना की जा सकती है। संयुक्त परिवार में रहने का फायदा यह है कि एक ही
छत के नीचे विभिन्न क्षमताओं से लैस लोग रहते है। जिससे कभी भी कोई काम नही रुकता और
ऊर्जा की भी बचत होती है।
आवश्यक
है कि संयुक्त परिवार के पुराने माँडल में सुधार करते हुए इसका नया ढाँचा बनाया
जाए। साथ ही परिवार के सभी सदस्यों की समझ को भी जगह देनी होगी। कई बार स्थान
विशेष या समुदाय के कारण भी घर में महिलाओं के निर्णय को उचित जगह नही दी जाती।
ऐसे इस ओर भी सुधारात्मक प्रयास किए जाने चाहिए। मीडिया के जरिए भी पारिवारिक
संस्था के मुल आधार को दिखाने के प्रयास किए जाने चाहिए। जिससे ही सभ्य समाज का
निर्माण संभव है। केवल अपने स्वार्थ के लिए एकल परिवार की व्यवस्था खड़ी नही की
जानी चाहिए। जब परिवार में ही अपनों की सोच को स्वीकार नही किया जा सकता, तो फिर
हम अपने समाज से बेहतर होने की अपेक्षा कैसे कर सकते है। है।
इस
दिशा में सरकार के ओर से भी पहल की जानी आवश्यक है। नए आर्थिक स्रोतों की तलाश
करके भी परिवारों को बिखरने से बचाया जा सकता हैं। क्योंकि परंपरागत कारोबार या
खेती बाड़ी की अपनी सीमायें होती हैं जो परिवार के बढ़ते सदस्यों के लिए सभी
आवश्यकतायें जुटा पाने में समर्थ नहीं होता। जिससे अधिकांश परिवार रोजगार की तलाश
में शहरों की ओर उन्मुख होते है। एकल और संयुक्त परिवार, दोनों के हित में आसानी
से एक आदर्श पारिवारिक संयुक्त परिवार का ढाँचा बनाया जा सकता है। संयुक्त परिवार
हमारी सामाजिक व्यवस्था का मूल आधार है। इसलिए जरुरी है कि वर्तमान में हमारे
संसाधनों की बचत के लिए और समाज के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए हमें हर कीमत पर
संयुक्त परिवार व्यवस्था को अपनाने के प्रयास किए जाए। नए संयुक्त परिवार की इस
अवधारणा को समाज निर्माण का आधार माना जा सकता है।
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