Wednesday, 14 May 2014

वाहनों की रफ्तार में थमता जीवन




हाल ही में नोएडा में बारहवें आटो एक्सपो का समापन हुआ। जिसमें कई नामी कपंनियों ने एक से एक बढकर वाहन प्रस्तुत किए गये। एक्सपो की इस चमक- दमक ने एक बड़ी भीड़ को आकर्षित किया है। वहीं तकनीकि के मामले में दुनिया में भारत की बढती पहुंच की झलक को भी दिखाया है। हालांकि इसके इतर वाहनों की बढती संख्या नें जिंदगी की रफ्तार को भी बढा दिया है। समय पर पहुंचने और कम समय में अधिक फासला तय करने लेने और अधिक काम करने की होड़ ने सड़को पर वाहनों की संख्या भी बढ गई है। साथ ही इन वाहनों की रफ्तार भी तीव्रतम हो गई है। बढती साधन सुविधा के साथ मृत्यु दर नें भी बढोतरी हुई है। अखबार के पन्नों पर आए दिन भयानक हादसों वाली खबरों से मन कांप जाता है। साथ ही ये डर भी दस्तक देने लगता है कि कही हम भी इसके शिकार न हो जाए।
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ो के अनुसार वर्ष 2011 में 440,123  सड़क हादसों में 136,834  लोगों की जान जा चुकी हैं।  यह तो आंकड़ो मात्र है क्योंकि हमारे देश में कितने ही हादसे तो पुलिस स्टेशन में दर्ज तक नही हो पाते। वर्ष 2001 की तुलना में सड़क हादसों की संख्या 44.2 प्रतिशत तक बढ चुकी है। इस तरह आसानी से कहा जा सकता है कि वर्ष 2020 तक हर तीन मिनट में एक व्यक्ति की मौत का कारण सड़क हादसे होंगे। चाहे मेट्रो हो या सड़क। आज हर कोई आगे बढना चाहता है, एक- दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है। कहीं भी धैर्य और प्रतीक्षा नही। कमोबेश हर जगह भागते लोग ही दिखाई देते है। जैसे सब मे उतावलापन सवार हो गया हो। ऐसी अस्थिर मानसिकता में गाड़ी चलाना किसी खतरे से खाली नही होता। और परिणामस्वरुप दुर्घटना घटती है। विश्व स्वास्थय संघठन की ओर से जारी रिपोर्ट वर्ल्ड रिपोर्ट ओन रोट ट्रैफिक में सड़क हादसों को गंभीर समस्या के रुप में लेते हुए रोट सेफ्टी नो एक्सीडेंट का नारा भी दिया गया।   
सड़क हादसों में होने वाली जान- माल की क्षति, घायल, विकंलाग होने के नुकसान और उपचार में होने वाली क्षति का आकलन करें तो यह भारी नुकसान होगा। स्वास्थय संबधी खतरों के मुख्य कारणों में से सड़क हादसा भी एक है। ज्यादातर मौतें सड़क हादसें में घायल लोगों को समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण होती है। अगर यही हाल रहा तो आंशका है कि वर्ष 2020 तक सड़क हादसें बड़ी स्वास्थय समस्या बनकर उभर सकते है। चौंकाने वाला तथ्य यह होगा कि यह खामियाजा बीमारियों से होने वाली हानि से भी बड़ा होगा।
     सड़क दुर्घटनाओं के लिए छ प्रमुख कारणों को जिम्मेदार माना गया है। इनमें तेज गति, शराब पीकर गाड़ी चलाना, हैलमेट और सीटबेल्ट नही पहनना और सड़कों की खराब हालत शामिल हैं। इसके अलावा वाहनों की खराब डिजाइनिंग, स्पष्ट नही दिखाई देना और सड़कों पर सुरक्षा संबधी उपायों के पूरे इंतजाम नही होना भी इनके हादसों के लिए जिम्मेदार है। वाहन तेज गति से चलाने के कारण दुर्घटना का खतरा तीस प्रतिशत तक बढ जाता है। और जिंदगी के बचने की संभावना क्षीण हो जाती है। शराब पीकर गाड़ी चलाने के कारण होने वाली दुर्घटनाओं का प्रतिशत गरीब और विकसित देशों में अलग- अलग है। देश में विगत वर्षों में नई- नई गाड़ियों के आने के बाद इन दुर्घटनाओं की रफ्तार बढी है। इस चिंताजनक स्थिति पर जल्द से जल्द ध्यान देने की जरुरत है। सड़क दुर्घटना का एक मनौवैज्ञानिक कारण भी है। आज की तनाव वाली मनोदशा से ग्रस्त चालकों से दुर्घटना की संभावना अधिक होती है। तनाव से भरे अशांत मन से गाड़ी चलाने में ध्यान केन्द्रित नही हो पाता है। इस पक्ष को भी नजरअंदाज नही किया जा सकता। अन्य कारणों की तरह इस पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। राजस्थान के जोधपुर में पिछलें दिनों वाहनों के  बीच आमने-    सामने की भिड़ंत में   14 लोगों की मौत का हादसा हो या आंध्र प्रदेश में हुए बस हादसे में 44  लोगों की मौत की घटना हो। सभी एक प्रश्न चिह्न हमारे समक्ष लिए खड़ी है।

सड़क हादसें केवल आकड़ें ही नही है, यें मुद्दा उन लोगों की जिंदगी पर भी गहरा असर डालता है, जिनके परिजन इसका शिकार होते है या जो हादसे के बाद विकलांग हो जिदंगी जीने को मजबुर रहते है। कई ख्याति प्राप्त कलाकारों को सड़क हादसों में खोने के बाद अब तो हमें दुर्घटनाओं पर लगाम कसने के बारे में तठस्थ होकर कार्य करना चाहिए। इनको रोकने में मीडिया को भी संवेदना के साथ केन्द्रिय भूमिका निभाई जानी चाहिए। साथ ही लोगों में जागरुकता लाकर समझा जाना चाहिए कि इस बड़ी चुनौती का समाधान किया जा सकता है। मीडिया जगत वाहनों की गति, शराब पीकर गाड़ी नही चलाना और ट्रैफिक नियमों को अपनाने के सबंध में विभिन्न कार्यक्रमों और विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक मुहिम छेड़ सकता है। सोशल मीडिया के जरिए भी युवाओं के बीच उनके तरीके से जागरुकता लाई जा सकती हैं। कोहरे के कारण भी सर्दियों में हादसों की संख्या बढ जाती हैं। लेकिन इसके बावजूद सड़क परिवहन को सुरक्षित बनाने के नाम पर कोई  राष्ट्रीय पहल कारगार नहीं दिखती। हादसों की जांच सामान्य तौर पर स्थानीय पुलिस ही करती है। जिसके पास  तकनीकी विशेषज्ञ नहीं के बराबर होते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कोई  ऐसी  संस्था होनी चाहिए जो परिवहन को सुरक्षित बनाने के लिए वैज्ञानिक ढंग से काम करे। और मौजूदा सिस्टम को जिम्मेदार बना एक असरदार नीति से कार्य करें। सरकार को इस संबध में अभी काफी कदम उठाये जाने बाकी है। जिंदगी अनमोल है इसलिए इसकी रक्षा किया जाना सर्वोपरि है। जल्द से जल्द इस ओर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। ताकि कई जिंदगियों को बेवजह थमने से बचाया जा सके।

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